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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..

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मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते..
मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते..
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते..
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे..
तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूं..
मैं मर्घट से ज़िन्दगी बुला के लाया हूं..
हूं आंख-मिचौनी खेल चला किस्मत से..
सौ बार म्रत्यु के गले चूम आया हूं..
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी..
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

शर्म के जल से राह सदा सिंचती है..
गती की मशाल आंधी मैं ही हंसती है..
शोलो से ही श्रिंगार पथिक का होता है..
मंजिल की मांग लहू से ही सजती है..
पग में गती आती है, छाले छिलने से..
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

फूलों से जग आसान नहीं होता है..
रुकने से पग गतीवान नहीं होता है..
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगती भी..
है नाश जहां निर्मम वहीं होता है..
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे..
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता..
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता..
वेह मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर..
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ्ता जाता..
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे..
तुम मेरा मन-मानस पाशाण करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

— गोपाल दास “नीरज”
— blog courtesy “Srivani” 

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मई 9, 2007 - Posted by | कविता, हिन्दी

14 टिप्पणियाँ »

  1. वाह भई, नीरज जी की रचना पेश करने हेतु आपका साधुवाद. बहुत दिनों बाद दिखे. सब ठीक ठाक तो है? 🙂

    टिप्पणी द्वारा समीर लाल | मई 9, 2007 | प्रतिक्रिया

  2. धन्यवाद समीर जी,
    सब ठीक है, जरा व्स्तता से बाहर आये हैं और दुबारा ब्लोगिंग शुरु करने का इरादा है.. 🙂

    राज गौरव..

    टिप्पणी द्वारा Raj Gaurav | मई 9, 2007 | प्रतिक्रिया

  3. बढ़िया बढ़िया.. बहुत बहुत शुक्रिया.. कई दिनों बाद ‘नीरज’ जी की रचना पढ़ने मिली..

    टिप्पणी द्वारा नीरज दीवान | मई 9, 2007 | प्रतिक्रिया

  4. राज गौरव जी,नीरज जी की रचना बहुत अरसे बाद पढने को मिली। धन्यवाद।

    टिप्पणी द्वारा paramjitbali | मई 9, 2007 | प्रतिक्रिया

  5. प्रेरणास्पद कविता !!!

    टिप्पणी द्वारा Nitin Bagla | मई 10, 2007 | प्रतिक्रिया

  6. inspirational

    टिप्पणी द्वारा Anil | अक्टूबर 24, 2007 | प्रतिक्रिया

  7. nice poem. i have no words 4 praise about ur writting

    टिप्पणी द्वारा kuldeep | अगस्त 21, 2009 | प्रतिक्रिया

  8. भविष्यवाणियों2010
    पूर्वी स्टार सितंबर में 2010 मार्क विस्फोट इमाम महदी आना
    अन्य विषयों इस ब्लॉग को पढ़ने दुनिया 2010 नवंबर में युद्ध III
    Whether appearing in 2010 constantly savior is
    Please continue to read the content of this blog I hope to be of interest to you
    http://emam-mahdi-1431.blogfa.com/
    Баба Ванга – Baba Vanga – World War III in November 2010 –
    september/2010 East explode in the sky star –

    टिप्पणी द्वारा fakhredin | अगस्त 13, 2010 | प्रतिक्रिया

  9. भविष्यवाणियों2010
    पूर्वी स्टार सितंबर में 2010 मार्क विस्फोट इमाम महदी आना 29/10/2010
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    http://emam-mahdi-1431.blogfa.com/
    Баба Ванга – Baba Vanga – World War III in November 2010 –
    29 october/2010 East explode in the sky star –

    टिप्पणी द्वारा fakhredin | सितम्बर 6, 2010 | प्रतिक्रिया

  10. कमाल करतेहो नीरजी…..
    मारदोगे
    क्या ?

    टिप्पणी द्वारा GAJANAN BHARATI | सितम्बर 30, 2011 | प्रतिक्रिया

  11. […] मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं.. […]

    पिंगबैक द्वारा Yaadein.. Tumse Khafa hai Hum | Muskan | जून 12, 2012 | प्रतिक्रिया

  12. आप की रचना पढकर बहुत अच्छा लगा आपकी रचना जीवन से जुङी हूई है धन्यवाद

    टिप्पणी द्वारा मुकेश वर्मा | सितम्बर 7, 2012 | प्रतिक्रिया

  13. वाह बेहद सुंदर रचना है जेहन में घर कर गया…

    टिप्पणी द्वारा अजय कुमार झा | नवम्बर 26, 2015 | प्रतिक्रिया

  14. अतिसुन्दर पंक्तियाँ मन को मुग्ध करतीं हैं
    कोटिशः धन्यवाद नीरज जी

    टिप्पणी द्वारा आशीष ठाकुर | जनवरी 7, 2016 | प्रतिक्रिया


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