शेर.. शायरी.. गीत..

मेरा संग्रह.. कुछ नया-कुछ पुराना..

असमन्जस..

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सीधा-साधा रास्ता भी मुझको,
अब लगता चौराहा-सा,
जाने किस धुन मे भाग रहा,
है हर इन्सा बौराया-सा.

पैसा-पैसा करता रह्ता,
है वो अमीर इतराया-सा,
जैसे-तैसे जीवन जीता,
है वो गरीब सकुचाया-सा.

ज्ञानी होने का ढोँग करे,
वो पढा-लिखा इठलाया-सा,
अनपढ है जो, वो भी बस यूँही,
है पडा हुआ अलसाया-सा.

किस राह से मुझको लक्ष्य मिले,
सोचे युवा भरमाया-सा,
जीवन की इस भाग-दौड मे,
है बालक घबराया-सा.

विज्ञान से सब सुख पा लूँगा,
सोचे मानव ललचाया-सा.
इतना बदला मेरा मानव??
सोचे ईश्वर पछताया-सा..!!!

————————————–रचना बजाज..

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सितम्बर 25, 2006 - Posted by | कविता

2 टिप्पणियाँ »

  1. thank you so much gaurav!!you made my poem to reach to more people..thanks again!

    टिप्पणी द्वारा Rachana | सितम्बर 25, 2006 | प्रतिक्रिया

  2. वास्तविकता की झलक.

    टिप्पणी द्वारा Prabhakar Pandey | सितम्बर 26, 2006 | प्रतिक्रिया


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