शेर.. शायरी.. गीत..

मेरा संग्रह.. कुछ नया-कुछ पुराना..

अभी ना जाओ छोड़ कर… के दिल अभी भरा नहीं…

अभी ना जाओ छोड़ कर… के दिल अभी भरा नहीं…
अभी-अभी तो आये हो, अभी-अभी तो…
अभी-अभी तो आये हो.. बहार बन के छाए हो…
हवा ज़रा महक तो ले… नज़र ज़रा बहेक़ तो ले…
यह शाम ढल तो ले ज़रा… यह दिल संभल तो ले ज़रा…
मैं थोड़ी देर जी तो लूं… नशे के घूँट पी तो लूं…
अभी तो कुछ कहा नहीं… अभी तो कुछ सुना नहीं…
अभी ना जाओ छोड़ कर… के दिल अभी भरा नहीं…

बुरा ना मानो बात का… यह प्यार है गिला नहीं…
अधूरी आस छोड़ के… अधूरी प्यास छोड़ के…
जो रोज़ यू ही जाओगे… तो किस तरह निभाओगे…
यह ज़िन्दगी की राह मे… जवां दिलों की चाह मे…
कई मकाम आयेंगे… जो हमको आजमाएंगे…
बुरा ना मानो बात का… यह प्यार है गिला नहीं…

नहीं… नहीं… नहीं… नहीं…  के दिल अभी भरा नहीं…
अभी ना जाओ छोड़ कर… के दिल अभी भरा नहीं… 🙂


फिल्म: हम दोनों.
इस गाने को सुने

अक्टूबर 22, 2011 Posted by | गीत, हिन्दी | 4 टिप्पणियाँ

शुभकामनाएं

मुझे खुशी है कि मैं आज से नियमित रूप से लिखने के लिए सक्षम हूँ ..
मैं लगभग 3 साल के बाद पोस्ट कर रहा हूँ .. मैं अपने ब्लॉग पर वापस लौटने के लिए उत्साहित हूँ.. आशा है कि एक अच्छा पोस्ट जल्द ही लिखूँगा.. 🙂

इस ब्लॉग को पढ़ने के लिए धन्यवाद!

अक्टूबर 22, 2011 Posted by | Uncategorized | 2 टिप्पणियाँ

हंगामा है क्यूं बरपा.. थोडी सी जो पी ली है..

हंगामा है क्यूं बरपा.. थोडी सी जो पी ली है..
डाका तो नहीं डाला.. चोरी तो नहीं की है..
 
उस मे से नही मतलब.. दिल जिस से है बेगाना..
मकसुद है उस मे से.. दिल ही मे जो खिंचती है..
 
सूरज में लगे धब्बा.. कुदरत के करिश्में हैं..
बुत हमको कहें काफ़िर.. अल्लाह की मर्ज़ी है..
 
ना तजुर्बाकारी से वाईज़ की ये बातें हैं..
इस रंग को क्या जाने.. पूछो तो कभी पी है..
 
वा दिल में की सदमे दो.. या की मे के सब सह लो..
उनका भी अजब दिल है.. मेरा भी अजब जी है.. 
 
हर ज़र्रा चमकता है.. अनवार-ए-इलाही से..
हर सांस ये कहती है.. हम हैं तो खुदाई है..
 
हंगामा है क्यूं बरपा.. थोडी सी जो पी ली है..
डाका तो नहीं डाला.. चोरी तो नहीं की है..
 
थोडी सी जो पी ली है..
 
इसे सुनें
 
लेखक – अकबर एलाहबादी
गायक – गुलाम अली

मई 18, 2008 Posted by | गज़ल, शायरी, हिन्दी | 20 टिप्पणियाँ

यादें.. तेरी यादें..

Yaadein..
उन लम्हों को कैसे ज़िन्दा करूं..
सांसें मैं लूं फ़िर भी पल-पल मरूं..
 
यादें.. यादें.. यादें.. तेरी यादें.. यादें.. यादें..
बातें.. बातें.. बातें.. तेरी.. बातें.. बातें.. बातें..
 
हल्की सी आहट हो तो लगे तुम आगये..
क्यूं तन्हा छोडकर मुझको रुला गये..
 
महफ़ूज़ है तू मेरी हर एक याद मैं..
बिखरा हुआ.. हुआ हूं बरबाद मैं..
 
यादें.. यादें.. यादें.. तेरी यादें.. यादें.. यादें..
बातें.. बातें.. बातें.. तेरी.. बातें.. बातें.. बातें..
 
मेहरूम हूं मैं तेरी हर एक बात से..
ना कोई नाता.. अब दिन और रात से..
 
हर लम्हा तड्प, हर लम्हा तेरी प्यास है..
जब से मैं हूं जुदा तेरे साथ से..
 
यादें.. यादें.. यादें.. तेरी यादें.. यादें.. यादें..
बातें.. बातें.. बातें.. तेरी.. बातें.. बातें.. बातें..
 
उन लम्हों को कैसे ज़िन्दा करूं..
सांसें मैं लूं फ़िर भी पल-पल मरूं..

A song by – Amit Sana..
Album – Yaadein

मई 15, 2008 Posted by | गीत, हिन्दी | 7 टिप्पणियाँ

पेहली नज़र में..

night-moon.jpg 

पेहली नज़र में.. कैसा जादू कर दिया..
तेरा बन बैठा है, मेरा जिया..
जाने क्या होगा..
क्या होगा.. क्या पता..
इस पल को मिलके.. आ जी ले ज़रा..
मैं हूं यहां.. तू है यहां..
मेरी बाहों मैं आ.. आ भी जा..  


ओ जानेजां.. दोनो जहां.. मेरी बाहों मैं आ.. भूलजा..


हर दुआ मे शामिल तेरा प्यार है..
बिन तेरे लम्हा भी दुशवार है..
धड्कनों को तुझसे ही दरकार है..
तुझसे हैं राहतें.. तुझसे है चाहतें..


तू जो मिली एक दिन मुझे.. मैं कहीं हो गया लापता..


ओ जानेजां.. दोनो जहां.. मेरी बाहों मैं आ.. भूलजा..


कर दिया दीवाना दर्द-ए-कश ने..
चैन छीना इश्क के एह्सास ने..
बेख्याली दी है तेरी प्यास ने..
छाया सुरूर है.. कुछ तो ज़रूर है..


ये दूरियां जीने ना दें.. हाल मेरा तुझे ना पता..


ओ जानेजां.. दोनो जहां.. मेरी बाहों मैं आ.. भूलजा..


Singer: Atif Aslam.


इसे “सुनें” / “देखें

फ़रवरी 16, 2008 Posted by | गीत, हिन्दी | 10 टिप्पणियाँ

आसमां के नीचे.. हम आज अपने पीछे..

 आसमां के नीचे..

आसमां के नीचे.. हम आज अपने पीछे..
प्यार का जहां बसा के चले.. कदम के निशां बना के चले..


आसमां के नीचे.. हम आज अपने पीछे..
प्यार का जहां बसा के चले.. कदम के निशां बना के चले..

–Jewel Thief
इसे “सुनें

दिसम्बर 7, 2007 Posted by | गीत, हिन्दी | 1 टिप्पणी

क्या लिखूँ..??

poem.jpg 

कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ..
या दिल का सारा प्यार लिखूँ..

कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखूँ या सापनो की सौगात लिखूँ..
मै खिलता सुरज आज लिखूँ या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ..

वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सांस लिखूँ..
वो पल मे बीते साल लिखूँ या सादियो लम्बी रात लिखूँ..

सागर सा गहरा हो जाऊं या अम्बर का विस्तार लिखूँ..
मै तुमको अपने पास लिखूँ या दूरी का ऐहसास लिखूँ..

वो पहली -पहली प्यास लिखूँ या निश्छल पहला प्यार लिखूँ..
सावन की बारिश मेँ भीगूँ या मैं
आंखों की बरसात लिखूँ..

कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ..
या दिल का सारा प्यार लिखूँ..

दिव्य प्रकाश..

मई 13, 2007 Posted by | कविता, हिन्दी | 27 टिप्पणियाँ

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..

gazin.jpg 

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते..
मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते..
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते..
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे..
तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूं..
मैं मर्घट से ज़िन्दगी बुला के लाया हूं..
हूं आंख-मिचौनी खेल चला किस्मत से..
सौ बार म्रत्यु के गले चूम आया हूं..
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी..
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

शर्म के जल से राह सदा सिंचती है..
गती की मशाल आंधी मैं ही हंसती है..
शोलो से ही श्रिंगार पथिक का होता है..
मंजिल की मांग लहू से ही सजती है..
पग में गती आती है, छाले छिलने से..
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

फूलों से जग आसान नहीं होता है..
रुकने से पग गतीवान नहीं होता है..
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगती भी..
है नाश जहां निर्मम वहीं होता है..
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे..
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता..
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता..
वेह मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर..
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ्ता जाता..
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे..
तुम मेरा मन-मानस पाशाण करो..

मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..

— गोपाल दास “नीरज”
— blog courtesy “Srivani” 

मई 9, 2007 Posted by | कविता, हिन्दी | 14 टिप्पणियाँ

जीना तेरे बिना..

 tears_1.jpg

जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम तो जिये तेरे बिन..
आजा अब तो आजा, तू कहीं से.. ये इल्तजा ले तू सुन..
तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..

दिल मेरा हर जगह.. बस तुझे ढूंढें यार..
झील, पर्वत, हवायें हैं मेरे गवाह..
शामें हों या सुबह.. हम तुझे ढूढें यार..
आते-जाते ये मौसम हैं सारे गवाह..
जरा बता रहे.. तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..
जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम क्यूं जियें तेरे बिन..

ये मेहफ़िल, मस्तियां सब तेरे बिन उदास..
सिर्फ़ तन्हाइयां हैं.. जायें जहां..
हां ये शहर, बस्तियां सब तेरे बिन उदास..
सिर्फ़ वीरानियां हैं.. जायें जहां..
जरा बता रहे.. तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..
जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम क्यूं जियें तेरे बिन..

दिल मेरा पागल याद में तेरी.. खोया रहे हर दम..
बिन तेरे जीना है नहीं आसां, ना है मुम्किन मेरा मरना..
जरा बता रहे.. तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..
जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम तो जिये तेरे बिन..
आजा अब तो आजा तू कहीं से.. ये इल्तजा ले तू सुन..

जीना तेरे बिना..

मार्च 25, 2007 Posted by | गीत, हिन्दी | 12 टिप्पणियाँ

हो सकता है..

 

करके मोहब्बत अपनी खता हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..

दरवाजे पर आहट सुनके उसकी तरफ़ ध्यान क्यूं गया..
आने वाली सिर्फ़ हवा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..

अर्ज़-ए-तलब पे उसकी चुप से ज़ाहिर है इंकार मगर..
शायद वो कुछ सोच रहा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..

खून-ए-तमन्ना करना उसका शेवा है मंज़ूर मगर..
हांथ मे उसके रंग-ए-हिना हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..

करके मोहब्बत अपनी खता हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..

—Author Unknown..

जनवरी 28, 2007 Posted by | शायरी, हिन्दी | 10 टिप्पणियाँ