शेर.. शायरी.. गीत..

मेरा संग्रह.. कुछ नया-कुछ पुराना..

मैं..

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इस अजनबी सी दुनिया में, अकेला इक ख्वाब हूँ.
सवालों से खफ़ा, चोट सा जवाब हूँ.

जो ना समझ सके, उनके लिये “कौन”.
जो समझ चुके, उनके लिये किताब हूँ.

दुनिया कि नज़रों में, जाने क्युं चुभा सा.
सबसे नशीला और बदनाम शराब हूँ.

सर उठा के देखो, वो देख रहा है तुमको.
जिसको न देखा उसने, वो चमकता आफ़ताब हूँ.

आँखों से देखोगे, तो खुश मुझे पाओगे.
दिल से पूछोगे, तो दर्द का सैलाब हूँ.

———————————— Author Unknown..

नवम्बर 14, 2006 Posted by | शायरी, हिन्दी | 7 टिप्पणियाँ

कोई..

Alwayz with me.. 

आज डब डबाते चश्मों में डूब गया कोई..
हां सांसों के सिलसिले से ऊब गया कोई..
ख्वाबों तक ने भी ढूंढे जिसकी आमद के निशां..
यूं अलविदा कहके क्या खूब गया कोई..

वो दम-ए-आखिर पे मुस्कुराया होगा..
उसने अंजाम् खुद् का गुनगुनाया होगा..
किसी की याद सबब रही होगी गर जो..
कतरा-ए-अश्क कोइ चश्मों से आया होगा..

नवम्बर 13, 2006 Posted by | शायरी, हिन्दी | 3 टिप्पणियाँ

इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

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हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..

इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

निगाह-ए-दिल की येही आखिरी तमन्ना है..

तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये मे शाम करता चलूं..

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..

उन्हे येह ज़िद है कि मुझे देखकर किसी और को ना देख..

मेरा येह शौक, कि सबसे कलाम करता चलूं.. 

इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

ये मेरे ख्वाबों की दुनिया नहीं, सही..

अब आ गया हूं तो दो दिन कयाम करता चलूं..

हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..

इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..

——————————————–शादाब..

इसे सुनें” जगजीत सिंह..

सितम्बर 29, 2006 Posted by | गीत, गज़ल, शायरी | टिप्पणी करे

बहुत है..

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जिनकी झलक मे करार बहुत है..

उसका मिलना दुशवार बहुत है..

जो मेरे हांथों की लकीरों मे नहीं..

उस से हमें प्यार बहुत है..

जिस को मेरे दिल का रास्ता भी नहीं मलूम..

इन धडकनों को उसका इंतेज़ार बहुत है..

येह हो नही सकता कि वो हमे भुला दे..

क्या करें हमे उसपे एतबार बहुत है..

——————————————–Author Unknown..

सितम्बर 23, 2006 Posted by | शायरी | टिप्पणी करे

सुदर्शन फ़ाकिर..

 

येह शीशे, येह सपने, येह रिश्ते, येह धागे..

किसे क्या खबर है, कहां टूट जायें..

मोहब्बत के दरिया मे, तिनके वफ़ा के..

न जाने किस मोड पर डूब जायें..

अजब दिल की बस्ती, अजब दिल की वादी..

हर एक मोड मौसम नयी ख्वाइशों का..

लगाये हैं हमने भी सपनों के पौधे..

मगर क्या भरोसा यहां बारिशों का..

मुरादों की मंज़िल के सपनों मे खोये..

मोहब्बत की राहों पे हम चल पडे थे..

ज़रा दूर चले और जब आंख खोलीं..

कडी धूप मे हम अकेले खडे थे..

जिन्हे दिल से चाहा.. जिन्हें दिल से पूजा..

वोही आ रहे हैं, नज़र अजनबी से..

रवायत है शायद येह सदियों पुरानी..

शिकायत नही है कोई ज़िन्दगी से..

————————————सुदर्शन फ़ाकिर..

क्या शर्त-ए-मोहब्बत है.. क्या शर्त-ए-ज़माना है..

आवाज़ भी ज़ख्मी है और गीत भी गाना है..

उस पार उतरने की उम्मीद बहुत कम है..

कश्ती भी पुरानी है.. तूफ़ां को भी आना है..

समझे या ना समझे वो अंदाज़ मोहब्बत के..

एक शक्स को आंखों से एक शेर सुनाना है..

भोली सी अदा, कोई फ़िर इश्क पर है..

फ़िर वोही आग का दरिया है, फ़िर डूब के जाना है..

—————————————–सुदर्शन फ़ाकिर.. 

सितम्बर 22, 2006 Posted by | शायरी | टिप्पणी करे

एक दीप जला रखा है..

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दिल की चोखट पे एक दीप जला रखा है..

तेरे लौट आने का सपना सज़ा रखा है..

सांस तक भी नहीं लेते है, तुझे सोचते वक्त..

हमने इस काम को भी, पलकों पे उठा रखा है..

रूठ जाते हो तो कुछ और हसीन लगते हो..

हमने येह सोच के ही तुमको खफ़ा रखा है..

चैन लेने नही देता येह किसी तरह से मुझे..

तेरी यादों ने जो दिल मे तूफ़ां मचा रखा है..

जाने वाले ने कहा था के वो लौट आयेगा ज़रूर..

एक इसी आस पे दरवाज़ा, हमने खुला रखा है..

तेरे जाने से जो धूल उठी थी गम की..

हमने उस धूल को, आंखों मे बसा रखा है..

मुझको कल शाम से वो बहुत याद आने लगा..

दिलने मुद्दतों से जो एक इंसान भुला रखा है..

आखिरी बार जो आया था मेरे नाम पैगाम..

मैने उसी कागज़ को दिल से लगा रखा है..

दिल की चौखट पे एक दीप जला रखा है..

—————————————–Author Unknown..

सितम्बर 17, 2006 Posted by | शायरी | 1 टिप्पणी

कभी-कभी..

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आंसू भरी ये आंखे, केहता है कभी-कभी..

गम-ए-इन्तेहां से गुज़र के, बेहता है कभी-कभी..

यादों के साथ जीने की कोशिश है उसकी..

जीने की चाह मे वो, मरता है कभी-कभी..

किसी की आरज़ू मे, सपनों को सजाया है उसने..

सपनो के सहारे वो, रोता है कभी-कभी..

नफ़रत की चादर तले, प्यार की खोज है उसकी..

प्यार उसकी ज़िन्दगी मे, आता है कभी-कभी..

कोई समझता नही है येह दर्द-ए-दिल उसका..

दर्द भी उसके दिल से दूर, जाता है कभी-कभी..

चेहरे पे मुस्कान लिये, गम छिपाया है उसने..

फ़साना-ए-दिल वोह, सुनाता है कभी-कभी..

—————————————–Author Unknown..

सितम्बर 17, 2006 Posted by | शायरी | टिप्पणी करे

येह ज़रूरी तो नहीं..

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तेरे दिल मे हो मेरा घर, येह ज़रूरी तो नहीं..

मेरी आहों मे हो असर, येह ज़रूरी तो नहीं..

चांद-सूरज हों मेरे हमसफ़र फ़िर भी..

मेरे घर मे हो सहर, येह ज़रूरी तो नहीं..

तेरे काफ़िले मे हों लाखों तेरे चाहने वाले..

फ़िर भी तू खुश हो,येह ज़रूरी तो नहीं..

तू फ़ूल है तो क्या, हम भी कांटे ही सही..

तुझपे ही हो सबकी नज़र, येह ज़रूरी तो नहीं..

भर के अशक आंखों मे उन्हे जाते देखा है..

मेरे साथ वो भी जाये बिखर, येह ज़रूरी तो नहीं..

माना खुशियों पे है उनका इख्तेयार ज़ालिम..

गम भी हो हमसे बे-खबर, येह ज़रूरी तो नहीं..

——————————————-Author Unknown..

उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं,
हर शब-ए-गम की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं।

चश्म-ए-साकी से पियो या लब-ए-सगर से पियो,
बेखुदी आठों पहर हो ये ज़रूरी तो नहीं।

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है,
उनकी आगोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं।

शेख करता तो है मस्ज़िद में खुदा को सज़दे,
उसके सज़दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं।

सबकी नज़रों में हो साकी ये ज़रूरी है मगर,
सब पे साकी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं।
——————————————-Author Unknown..

सितम्बर 16, 2006 Posted by | शायरी | टिप्पणी करे

तुम आओ, तो कोई बात बने..

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तुम मेरी याद हो, मेरे पास आओ तो कोई बात बने..

तुम मेरी जान हो, यूं ज़िन्दगी मे आओ तो कोई बात बने..

तुम्हारी याद मे गुज़रा हर लम्हा मेरे दिन को मेहकाता है..

खुशबू बन मेरी सासों को मेहकाओ तो कोई बात बने..

मैं दुनिया कि नही करता परवाह, तुमको जब याद करता हूं..

कभी तुम भी रुसवाइयों को गले लगाओ तो कोई बात बने..

रकीबों को तुम्हारे बारे मे बताने मे अच्छा नहीं लगता..

कभी खुद भी आओ, मेरे हाल पे हंस जाओ, तो कोई बात बने..

कभी रूठा नही हूं तुमसे मैं इस तरह से के..

मैं तुमसे रूठ जाऊं और तुम मुझे मनाओ, तो कोई बात बने..

हमेशा खुदा से ही तुमको मांगा है शाम-ओ-सहर..

दुआ को हांथ उठे, सामने तुम्हें पाऊं, तो कोई बात बने..

कलाम रुकता नही है, याद का दरिया बह जाता है..

कभी तुम भी इस मे डूब जाओ, तो कोई बात बने..

——————————————–Author Unknown..

सितम्बर 12, 2006 Posted by | शायरी | टिप्पणी करे

दुआ कैसे करूं..??

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सुकून-ए-दिल के लिये अब मैं दुआ कैसे करूं..

दर्द जब तूने दिया है तो गिला कैसे करूं..

अकसर लौटा हूं मंज़िल से यही सोच के मैं..

अब मुक्कमल येह सफ़र, तेरे बिना कैसे करूं..

मेरे शेरों मे येह असर कहां था पेहले..

कर्ज़ मैं तेरी ज़फ़ाओं का अदा कैसे करूं..

ज़िन्दगी भर की वफ़ायों का सिला है यारों..

इस दर्द की दवा कैसे करूं..

थी कोई मेरे हाथों की लकीरों मे कमी..

अपनी तकदीर का अब तुझसे गिला कैसे करूं..

मेरी नस-नस मे बसा है जो लहू बनके दोस्त..

उसकी यादों से किनारा कैसे करूं..

अब मुनासिब है येह कि उसको भुला दूं “मैं”..

हां, मगर फ़ूल को खुशबू से जुदा कैसे करूं..

—————————————-Author Unknown..

सितम्बर 12, 2006 Posted by | शायरी | 1 टिप्पणी

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