हो सकता है..
करके मोहब्बत अपनी खता हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
दरवाजे पर आहट सुनके उसकी तरफ़ ध्यान क्यूं गया..
आने वाली सिर्फ़ हवा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
अर्ज़-ए-तलब पे उसकी चुप से ज़ाहिर है इंकार मगर..
शायद वो कुछ सोच रहा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
खून-ए-तमन्ना करना उसका शेवा है मंज़ूर मगर..
हांथ मे उसके रंग-ए-हिना हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
करके मोहब्बत अपनी खता हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
—Author Unknown..

सुंदर शायरी पेश करने के लिए बधाई…जिसने भी कहा है बड़े दिल से कहा है!
Bahut hi pyari gazal
now i am big fan of your blog…
सुन्दर गजल
भाड में गया गम,
रोना कर कम,
दम मारो दम।
फोड खुशी के बम,
पी सोडा या रम,
मत कर आँखे नम,
दम मारो दम।
गम ना होंगे कभी कम,
ना जाएंगे कभी थम,
है अगर तुझमे दम,
तो क्या है फिर ये गम,
दम मारो दम।
तो गुरू… हो जाओ शुरू…
rg
अर्ज़-ए-तलब पे उसकी चुप से ज़ाहिर है इंकार मगर..
शायद वो कुछ सोच रहा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
kya baat bahut sunder