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रास्तों की मर्ज़ी है..

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बे-ज़मीं लोगों को..
बे-करार आंखों को..
बद-नसीब कदमों को..
जिस तरफ़ भी ले जायें..
रास्तों की मर्ज़ी है..

बे-निशां जज़ीरों पर..
बद-गुमा शहरों में..
बे-ज़ुबां मुसाफ़िर को..
जिस तरफ़ भी भटकायें..
रस्तों की मर्ज़ी है..

रोक लें या बढने दें..
थाम लें या गिरने दें..
वस्ल की लकीरों को..
तोड दें या मिलने दें..
रास्तों की मर्ज़ी है..

अजनबी कोई लाकर..
हमसफ़र बना डालें..
साथ चलने वालों की..
राह जुदा बना डालें..
या मुसाफ़तें सारी..
खाक मे मिला डालें..
रास्तों की मर्ज़ी है..

— Author Unknown..

December 28, 2006 - Posted by Raj Gaurav | शायरी, हिन्दी | | 4 Comments

4 Comments »

  1. अजनबी कोई लाकर..

    हमसफ़र बना डालें..

    साथ चलने वालों की..

    राह जुदा बना डालें..

    या मुसाफ़तें सारी..

    खाक मे मिला डालें..

    रास्तों की मर्ज़ी है..

    —क्या खुब खोज कर लाते हैं. आपकी पसंद हमेशा पसंद आती है. जारी रहें. :)

    Comment by समीर लाल | December 28, 2006 | Reply

  2. बहुत बहुत शुक्रिया.. :)

    Comment by Raj Gaurav | December 28, 2006 | Reply

  3. रचना अच्छी लाये हैं आप और अगर मैं गलत नहीं हूँ तो यह संभवत: मोना शहाब की नज़्म है.

    Comment by राकेश खंडेलवाल | December 29, 2006 | Reply

  4. Very well said

    Comment by Manish | September 18, 2009 | Reply


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