शेर.. शायरी.. गीत..

मेरा संग्रह.. कुछ नया-कुछ पुराना..

क्यूं..

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आंख से आंख मिला, बात बनाता क्यूं है..

तू अगर मुझसे खफ़ा है, तो छिपाता क्यूं है..??

गैर लगता है ना अपनों की तरह मिलता है..

तू ज़माने की तरह मुझको सताता क्यूं है..??

वक्त के साथ हालात बदल जाते हैं..

ये हकीकत है मगर, मुझको सुनाता क्यूं है..??

एक मुद्दत से जहां काफ़िले गुज़रे ही नहीं..

ऐसी राहों पे चिरागों को जलाता क्यूं है..??

— सयीद राही..

November 22, 2006 Posted by Raj Gaurav | शायरी, हिन्दी | | 1 Comment