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मेरी माँ..

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नये ज़माने के रंग में,
पुरानी सी लगती है जो|

आगे बढने वालों के बीच,
पिछङी सी लगती है जो|

गिर जाने पर मेरे,
दर्द से सिहर जाती है जो|

चश्मे के पीछे ,आँखें गढाए,
हर चेहरे में मुझे निहारती है जो|

खिङकी के पीछे ,टकटकी लगाए,
मेरा इन्तजार करती है जो|

सुई में धागा डालने के लिये,
हर बार मेरी मनुहार करती है जो|

तवे से उतरे हुए ,गरम फुल्कों में,
जाने कितना स्वाद भर देती है जो|

मुझे परदेस भेज ,अब याद करके,
कभी-कभी पलकें भिगा लेती है जो|

मेरी खुशियों का लवण,मेरे जीवन का सार,
मेरी मुस्कुराहटों की मिठास,मेरी आशाओं का आधार,
मेरी माँ, हाँ मेरी माँ ही तो है वो|

शिल्पा अग्रवाल

September 29, 2006 - Posted by Raj Gaurav | कविता | | 3 Comments

3 Comments »

  1. dhanyavaad Rajgaurav ji is protsaahan ke liye

    Comment by Shilpa | October 2, 2006 | Reply

  2. good,altimate words i like these words

    Comment by reena | March 6, 2007 | Reply

  3. padhk maa yad aa gai

    Comment by bharat bhushan | April 15, 2009 | Reply


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