शेर.. शायरी.. गीत..

मेरा संग्रह.. कुछ नया-कुछ पुराना..

सुदर्शन फ़ाकिर..

 

येह शीशे, येह सपने, येह रिश्ते, येह धागे..

किसे क्या खबर है, कहां टूट जायें..

मोहब्बत के दरिया मे, तिनके वफ़ा के..

न जाने किस मोड पर डूब जायें..

अजब दिल की बस्ती, अजब दिल की वादी..

हर एक मोड मौसम नयी ख्वाइशों का..

लगाये हैं हमने भी सपनों के पौधे..

मगर क्या भरोसा यहां बारिशों का..

मुरादों की मंज़िल के सपनों मे खोये..

मोहब्बत की राहों पे हम चल पडे थे..

ज़रा दूर चले और जब आंख खोलीं..

कडी धूप मे हम अकेले खडे थे..

जिन्हे दिल से चाहा.. जिन्हें दिल से पूजा..

वोही आ रहे हैं, नज़र अजनबी से..

रवायत है शायद येह सदियों पुरानी..

शिकायत नही है कोई ज़िन्दगी से..

————————————सुदर्शन फ़ाकिर..

क्या शर्त-ए-मोहब्बत है.. क्या शर्त-ए-ज़माना है..

आवाज़ भी ज़ख्मी है और गीत भी गाना है..

उस पार उतरने की उम्मीद बहुत कम है..

कश्ती भी पुरानी है.. तूफ़ां को भी आना है..

समझे या ना समझे वो अंदाज़ मोहब्बत के..

एक शक्स को आंखों से एक शेर सुनाना है..

भोली सी अदा, कोई फ़िर इश्क पर है..

फ़िर वोही आग का दरिया है, फ़िर डूब के जाना है..

—————————————–सुदर्शन फ़ाकिर.. 

September 22, 2006 Posted by Raj Gaurav | शायरी | | No Comments Yet