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येह ज़रूरी तो नहीं..

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तेरे दिल मे हो मेरा घर, येह ज़रूरी तो नहीं..

मेरी आहों मे हो असर, येह ज़रूरी तो नहीं..

चांद-सूरज हों मेरे हमसफ़र फ़िर भी..

मेरे घर मे हो सहर, येह ज़रूरी तो नहीं..

तेरे काफ़िले मे हों लाखों तेरे चाहने वाले..

फ़िर भी तू खुश हो,येह ज़रूरी तो नहीं..

तू फ़ूल है तो क्या, हम भी कांटे ही सही..

तुझपे ही हो सबकी नज़र, येह ज़रूरी तो नहीं..

भर के अशक आंखों मे उन्हे जाते देखा है..

मेरे साथ वो भी जाये बिखर, येह ज़रूरी तो नहीं..

माना खुशियों पे है उनका इख्तेयार ज़ालिम..

गम भी हो हमसे बे-खबर, येह ज़रूरी तो नहीं..

——————————————-Author Unknown..

उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं,
हर शब-ए-गम की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं।

चश्म-ए-साकी से पियो या लब-ए-सगर से पियो,
बेखुदी आठों पहर हो ये ज़रूरी तो नहीं।

नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है,
उनकी आगोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं।

शेख करता तो है मस्ज़िद में खुदा को सज़दे,
उसके सज़दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं।

सबकी नज़रों में हो साकी ये ज़रूरी है मगर,
सब पे साकी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं।
——————————————-Author Unknown..

September 16, 2006 - Posted by Raj Gaurav | शायरी | | No Comments Yet

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