शेर.. शायरी.. गीत..

मेरा संग्रह.. कुछ नया-कुछ पुराना..

हम चुप रेहते हैं..

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कौन सुनेगा-किसको सुनायें, इसलिये चुप रेहते हैं..

हमसे अपने रूठ ना जायें, इसलिये चुप रेहते हैं..

मेरी सूरत देखने वालों, मैं भी एक आईना था..

टूटा जबसे शीशा-ए-दिल सावन का महीना था..

टुकडे दिलके किसको दिखायें, इसलिये चुप रेहते हैं..

हमसे अपने रूठ ना जायें, इसलिये चुप रेहते हैं..

आज खुशी की महफ़िल मे, अपना जी भर आया है..

गम की कोई बात नहीं है, हमें खुशी ने रुलाया है..

आंखसे आंसू बह ना आयें, इसलिये चुप रेहते हैं..

हमसे अपने रूठ ना जायें, इसलिये चुप रेहते हैं..

प्यार के फ़ूल चुने थे हमने, खुशी की सेज़ सजाने को..

शोला बनकर आयीं बहारें, घरमे आग लगाने को..

आग मे गम की जल ना जायें, इसलिये चुप रेहते हैं..

कौन सुनेगा-किसको सुनायें, इसलिये चुप रेहते हैं..

————————————————–Author Unknown..

September 6, 2006 Posted by Raj Gaurav | शायरी | | No Comments Yet