मेरी माँ..
नये ज़माने के रंग में,
पुरानी सी लगती है जो|
आगे बढने वालों के बीच,
पिछङी सी लगती है जो|
गिर जाने पर मेरे,
दर्द से सिहर जाती है जो|
चश्मे के पीछे ,आँखें गढाए,
हर चेहरे में मुझे निहारती है जो|
खिङकी के पीछे ,टकटकी लगाए,
मेरा इन्तजार करती है जो|
सुई में धागा डालने के लिये,
हर बार मेरी मनुहार करती है जो|
तवे से उतरे हुए ,गरम फुल्कों में,
जाने कितना स्वाद भर देती है जो|
मुझे परदेस भेज ,अब याद करके,
कभी-कभी पलकें भिगा लेती है जो|
मेरी खुशियों का लवण,मेरे जीवन का सार,
मेरी मुस्कुराहटों की मिठास,मेरी आशाओं का आधार,
मेरी माँ, हाँ मेरी माँ ही तो है वो|
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..
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हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..
निगाह-ए-दिल की येही आखिरी तमन्ना है..
तुम्हारी ज़ुल्फ़ के साये मे शाम करता चलूं..
हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
उन्हे येह ज़िद है कि मुझे देखकर किसी और को ना देख..
मेरा येह शौक, कि सबसे कलाम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..
ये मेरे ख्वाबों की दुनिया नहीं, सही..
अब आ गया हूं तो दो दिन कयाम करता चलूं..
हज़ूर आपका भी एह्तराम करता चलूं..
इधर से गुज़रा था.. सोचा सलाम करता चलूं..
——————————————–शादाब..
“इसे सुनें” जगजीत सिंह..
ब्राह्मण..
ब्राह्मण
मैं हिन्दू हूँ, जी हाँ एक हिन्दू,
कुछ गलत रुढ़ियों एवं प्रथाओं का एक बिन्दू,
हाँ मैं एक हिन्दू.
ना-ना-ना,
हिन्दू तक तो ठीक था,पर जानते नहीं,
मैं हिन्दू में ही हूँ, ब्राह्मण, पंडित, चंदनधारी,
अच्छे कर्मों का अधिकारी.
छूना मत मेरा भोजन वर्ना वह अपवित्र कहलाएगा,
मैं रह जाऊँगा भूखा-भूखा, जानते नहीं,
तूझे मेरा भोजन छिनने का पाप लग जाएगा.
मैं भी जानता हूँ, इस अन्न को तूने ही उगाया है,
कूट-पीसकर चावल बनाया है,
ये मिर्च व मसाले हैं तेरे खेत के,
नमक को भी तूने ही सुखाया है.
जहाँ तक है इस बरतन का सवाल,
तूने ही दिया इसको यह आकार.
कुछ भी हो तुम क्षुद्र ही तो हो,
पर मैं तुमसे ऊँचा हूँ, ब्राह्मण हूँ.
ये ठीक है इस कूप को खोदने में,
हर जीव को जल देने में,
तूने खून-पसीना एक किया,
पर अब अपना लोटा ना डुबा,
इस वक्त इसे ना करो अपवित्र,
पहले मुझे जल भर लेने दो,
हींकभर पी लेने दो, वर्ना
मैं जल बिन मीन हो जाऊँगा.
देखो कितनी तेज बारिश है,
मैं भीग रहा हूँ, निकलो झोपड़ी से बाहर,
मैं कैसे बैठूँ तेरे साथ, अपवित्र हो जाऊँगा.
ब्राह्मण हूँ.
मैंने कब कहा कि ये कपड़े,
जो मैंने पहने हैं, तूने नहीं बनाए,
अरे साफ कर दिए तो क्या हुआ,
यह अपवित्र हुआ ?
पर मेरे छूने से पवित्र हुआ,
मैं इतना देखता चलूँ तो पागल हो जाऊँगा,
देख ! इसे अब मत छूना,मैं ब्राह्मण हूँ.
आओ बैठो पैर दबाओ,थोड़ा ठंडा तेल लगाओ,
करो धीरे-धीरे मालिश,दूँगा तूझे ढेर आशीष,
पर तुम मुझको छूना नहीं,अपवित्र हो जाऊँगा.
ब्राह्मण हूँ.
मैं मानता हूँ, तेरे बिन मैं जी नहीं सकता,
हर वक्त,हर क्षण मुझे तेरी जरूरत है,
जबतक तू ना देता बनाकर शादी का डाल,
नहीं हो सकता मेरा शुभविवाह.
पर मैं तुमसे ऊँचा हूँ, ब्राह्मण हूँ.
मेरी माँ भी कहती थी, मेरे पैदा होने के वक्त,
तू माँ के पास रह रही थी,अरे यह क्या ?
मेरे जमीं पर गिरने के वक्त तो,
माँ दर्द से छटपटा रही थी,
उस समय तू मुझे सीने से लगाए,
प्रेम से चुमचाट रही थी.
पर देख अब मुझे मत छूना, ब्राह्मण हूँ.
मैंने धारण किए जनेऊ,माथे पर चंदन,
करुँगा प्रभु का पूजन,
पर तू कर पहले मेरा पूजन,
मैं ब्राह्मण हूँ.
मैं स्पष्ट कहता हूँ,
तेरी कृपा से ही जिंदा रहता हूँ,
पर इससे क्या,यह तेरा एहसान नहीं,
मेरा ही एहसान है तुझपर.
मैं ब्राह्मण हूँ, हूँ, हूँ. छूना मत.
अपवित्र हो जाऊँगा.
असमन्जस..
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सीधा-साधा रास्ता भी मुझको,
अब लगता चौराहा-सा,
जाने किस धुन मे भाग रहा,
है हर इन्सा बौराया-सा.
पैसा-पैसा करता रह्ता,
है वो अमीर इतराया-सा,
जैसे-तैसे जीवन जीता,
है वो गरीब सकुचाया-सा.
ज्ञानी होने का ढोँग करे,
वो पढा-लिखा इठलाया-सा,
अनपढ है जो, वो भी बस यूँही,
है पडा हुआ अलसाया-सा.
किस राह से मुझको लक्ष्य मिले,
सोचे युवा भरमाया-सा,
जीवन की इस भाग-दौड मे,
है बालक घबराया-सा.
विज्ञान से सब सुख पा लूँगा,
सोचे मानव ललचाया-सा.
इतना बदला मेरा मानव??
सोचे ईश्वर पछताया-सा..!!!
————————————–रचना बजाज..
बहुत है..
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जिनकी झलक मे करार बहुत है..
उसका मिलना दुशवार बहुत है..
जो मेरे हांथों की लकीरों मे नहीं..
उस से हमें प्यार बहुत है..
जिस को मेरे दिल का रास्ता भी नहीं मलूम..
इन धडकनों को उसका इंतेज़ार बहुत है..
येह हो नही सकता कि वो हमे भुला दे..
क्या करें हमे उसपे एतबार बहुत है..
——————————————–Author Unknown..
सुदर्शन फ़ाकिर..
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येह शीशे, येह सपने, येह रिश्ते, येह धागे..
किसे क्या खबर है, कहां टूट जायें..
मोहब्बत के दरिया मे, तिनके वफ़ा के..
न जाने किस मोड पर डूब जायें..
अजब दिल की बस्ती, अजब दिल की वादी..
हर एक मोड मौसम नयी ख्वाइशों का..
लगाये हैं हमने भी सपनों के पौधे..
मगर क्या भरोसा यहां बारिशों का..
मुरादों की मंज़िल के सपनों मे खोये..
मोहब्बत की राहों पे हम चल पडे थे..
ज़रा दूर चले और जब आंख खोलीं..
कडी धूप मे हम अकेले खडे थे..
जिन्हे दिल से चाहा.. जिन्हें दिल से पूजा..
वोही आ रहे हैं, नज़र अजनबी से..
रवायत है शायद येह सदियों पुरानी..
शिकायत नही है कोई ज़िन्दगी से..
————————————सुदर्शन फ़ाकिर..
क्या शर्त-ए-मोहब्बत है.. क्या शर्त-ए-ज़माना है..
आवाज़ भी ज़ख्मी है और गीत भी गाना है..
उस पार उतरने की उम्मीद बहुत कम है..
कश्ती भी पुरानी है.. तूफ़ां को भी आना है..
समझे या ना समझे वो अंदाज़ मोहब्बत के..
एक शक्स को आंखों से एक शेर सुनाना है..
भोली सी अदा, कोई फ़िर इश्क पर है..
फ़िर वोही आग का दरिया है, फ़िर डूब के जाना है..
—————————————–सुदर्शन फ़ाकिर..
एक दीप जला रखा है..
दिल की चोखट पे एक दीप जला रखा है..
तेरे लौट आने का सपना सज़ा रखा है..
सांस तक भी नहीं लेते है, तुझे सोचते वक्त..
हमने इस काम को भी, पलकों पे उठा रखा है..
रूठ जाते हो तो कुछ और हसीन लगते हो..
हमने येह सोच के ही तुमको खफ़ा रखा है..
चैन लेने नही देता येह किसी तरह से मुझे..
तेरी यादों ने जो दिल मे तूफ़ां मचा रखा है..
जाने वाले ने कहा था के वो लौट आयेगा ज़रूर..
एक इसी आस पे दरवाज़ा, हमने खुला रखा है..
तेरे जाने से जो धूल उठी थी गम की..
हमने उस धूल को, आंखों मे बसा रखा है..
मुझको कल शाम से वो बहुत याद आने लगा..
दिलने मुद्दतों से जो एक इंसान भुला रखा है..
आखिरी बार जो आया था मेरे नाम पैगाम..
मैने उसी कागज़ को दिल से लगा रखा है..
दिल की चौखट पे एक दीप जला रखा है..
—————————————–Author Unknown..
कभी-कभी..
आंसू भरी ये आंखे, केहता है कभी-कभी..
गम-ए-इन्तेहां से गुज़र के, बेहता है कभी-कभी..
यादों के साथ जीने की कोशिश है उसकी..
जीने की चाह मे वो, मरता है कभी-कभी..
किसी की आरज़ू मे, सपनों को सजाया है उसने..
सपनो के सहारे वो, रोता है कभी-कभी..
नफ़रत की चादर तले, प्यार की खोज है उसकी..
प्यार उसकी ज़िन्दगी मे, आता है कभी-कभी..
कोई समझता नही है येह दर्द-ए-दिल उसका..
दर्द भी उसके दिल से दूर, जाता है कभी-कभी..
चेहरे पे मुस्कान लिये, गम छिपाया है उसने..
फ़साना-ए-दिल वोह, सुनाता है कभी-कभी..
—————————————–Author Unknown..
येह ज़रूरी तो नहीं..
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तेरे दिल मे हो मेरा घर, येह ज़रूरी तो नहीं..
मेरी आहों मे हो असर, येह ज़रूरी तो नहीं..
चांद-सूरज हों मेरे हमसफ़र फ़िर भी..
मेरे घर मे हो सहर, येह ज़रूरी तो नहीं..
तेरे काफ़िले मे हों लाखों तेरे चाहने वाले..
फ़िर भी तू खुश हो,येह ज़रूरी तो नहीं..
तू फ़ूल है तो क्या, हम भी कांटे ही सही..
तुझपे ही हो सबकी नज़र, येह ज़रूरी तो नहीं..
भर के अशक आंखों मे उन्हे जाते देखा है..
मेरे साथ वो भी जाये बिखर, येह ज़रूरी तो नहीं..
माना खुशियों पे है उनका इख्तेयार ज़ालिम..
गम भी हो हमसे बे-खबर, येह ज़रूरी तो नहीं..
——————————————-Author Unknown..
उम्र जलवों में बसर हो ये ज़रूरी तो नहीं,
हर शब-ए-गम की सहर हो ये ज़रूरी तो नहीं।
चश्म-ए-साकी से पियो या लब-ए-सगर से पियो,
बेखुदी आठों पहर हो ये ज़रूरी तो नहीं।
नींद तो दर्द के बिस्तर पे भी आ सकती है,
उनकी आगोश में सर हो ये ज़रूरी तो नहीं।
शेख करता तो है मस्ज़िद में खुदा को सज़दे,
उसके सज़दों में असर हो ये ज़रूरी तो नहीं।
सबकी नज़रों में हो साकी ये ज़रूरी है मगर,
सब पे साकी की नज़र हो ये ज़रूरी तो नहीं।
——————————————-Author Unknown..
तुम आओ, तो कोई बात बने..
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तुम मेरी याद हो, मेरे पास आओ तो कोई बात बने..
तुम मेरी जान हो, यूं ज़िन्दगी मे आओ तो कोई बात बने..
तुम्हारी याद मे गुज़रा हर लम्हा मेरे दिन को मेहकाता है..
खुशबू बन मेरी सासों को मेहकाओ तो कोई बात बने..
मैं दुनिया कि नही करता परवाह, तुमको जब याद करता हूं..
कभी तुम भी रुसवाइयों को गले लगाओ तो कोई बात बने..
रकीबों को तुम्हारे बारे मे बताने मे अच्छा नहीं लगता..
कभी खुद भी आओ, मेरे हाल पे हंस जाओ, तो कोई बात बने..
कभी रूठा नही हूं तुमसे मैं इस तरह से के..
मैं तुमसे रूठ जाऊं और तुम मुझे मनाओ, तो कोई बात बने..
हमेशा खुदा से ही तुमको मांगा है शाम-ओ-सहर..
दुआ को हांथ उठे, सामने तुम्हें पाऊं, तो कोई बात बने..
कलाम रुकता नही है, याद का दरिया बह जाता है..
कभी तुम भी इस मे डूब जाओ, तो कोई बात बने..
——————————————–Author Unknown..


