शेर.. शायरी.. गीत..

मेरा संग्रह.. कुछ नया-कुछ पुराना..

कैसे जिया तेरे बिन..

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तेरे बिन, मैं यूं कैसे जिया,  कैसे जिया तेरे बिन..

तेरे बिन, मैं यूं कैसे जिया,  कैसे जिया तेरे बिन..

लेकर यादें तेरी, रातें मेरी कटी..

मुझसे बातें तेरी करती हैं चांदनी..

तन्हा हैं तुझ बिन रातें मेरी..

दिन मेरे दिन के जैसे नहीं..

तन्हा बदन, तन्हा है रूह.. नम मेरी आखें रहें..

आजा मेरे अब रूबरू, जीना नही बिन तेरे..

तेरे बिन, मैं यूं कैसे जिया,  कैसे जिया तेरे बिन..

कब से आखें मेरी राह मे तेरे बिछीं..

भूले से ही कभी.. तूने लजाये कहीं..

भूलें ना मुझसे बातें तेरी.. भीगी हैं हर-पल आखें मेरी..

क्युं सांस लू, क्यु मैं जियूं, जीना बुरा सा लगे..

क्युं हो गया तू बेवफ़ा, मुझको बतादे वजह..

तेरे बिन, मैं यूं कैसे जिया,  कैसे जिया तेरे बिन..

तेरे बिन, मैं यूं कैसे जिया,  कैसे जिया तेरे बिन..

तेरे बिन.. तेरे बिन.. तेरे बिन.. मै ऐसे जिया..

—————————————————-आतिफ़ अस्लम..

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August 24, 2006 Posted by Raj Gaurav | गीत | | No Comments Yet

दोस्ती..

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दोस्ती नाम नहीं सिर्फ़ दोस्तों के साथ रेहने का..
बल्की दोस्त ही जिन्दगी बन जाते हैं, दोस्ती में..

जरुरत नहीं पडती, दोस्तों की तस्वीर की.
देखो जो आईना तो दोस्त नज़र आते हैं, दोस्ती में..

येह तो बहाना है कि मिल नहीं पाये दोस्तों से आज..
दिल पे हाथ रखते ही एहसास उनके हो जाते हैं, दोस्ती में..

नाम की तो जरूरत ही नहीं पडती इस रिश्ते मे कभी..
पूछे नाम अपना ओर, दोस्तॊं का बताते हैं, दोस्ती में..

कौन केहता है कि दोस्त हो सकते हैं जुदा कभी..
दूर रेह्कर भी दोस्त, बिल्कुल करीब नज़र आते हैं, दोस्ती में..

सिर्फ़ भ्रम है कि दोस्त होते हैं अलग-अलग..
दर्द हो इनको ओर, आंसू उनके आते हैं , दोस्ती में..

माना इश्क है खुदा, प्यार करने वालों के लिये “अभी”
पर हम तो अपना सिर झुकाते हैं, दोस्ती में..

ओर एक ही दवा है गम की दुनिया में क्युकि..
भूल के सारे गम, दोस्तों के साथ मुस्कुराते हैं, दोस्ती में..

————————————————-अभिनव जैन..

August 24, 2006 Posted by Raj Gaurav | कविता | | 28 Comments

चाह्ता हूं, मैं..

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एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..

खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं..

दोस्तॊं से दोस्ती तो हर कोई निभाता है..

दुश्मनों को भी अपना दोस्त बनाना चाहता हूं, मैं..

जो हम उडे ऊचाई पे अकेले, तो क्या नया किया..

साथ मे हर किसी के पंख फ़ैलाना चाह्ता हूं, मैं..

वोह सोचते हैं कि मैं अकेला हूं उन्के बिना..

तन्हाई साथ है मेरे, इतना बताना चाह्ता हूं..

ए खुदा, तमन्ना बस इतनी सी है.. कबूल करना..

मुस्कुराते हुए ही तेरे पास आना चाह्ता हूं, मैं..

बस खुशी हो हर पल, और मेहकें येह गुल्शन सारा “अभी”..

हर किसी के गम को, अपना बनाना चाह्ता हूं, मैं..

एक ऐसा गीत गाना चाह्ता हूं, मैं..

खुशी हो या गम, बस मुस्कुराना चाह्ता हूं, मैं..

——————————————- अभिनव जैन..

August 24, 2006 Posted by Raj Gaurav | कविता | | 1 Comment

ना मिलेगा..

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भीगी हुई आंखों का ये मंज़र ना मिलेगा..

घर छोड के ना जाओ, कहीं घर ना मिलेगा..

फ़िर याद बहुत आयेगी, वो ज़ुल्फ़ों की घनी शाम..

जब धूप मे साया कोई सर पे ना मिलेगा..

आंसू को कभी ओस का कतरा ना समझना..

ऐसा तुम्हे चाहत का समंदर ना मिलेगा..

इस ख्वाब के माहोल मे, बे-ख्वाब हैं आंखें..

जब नींद बहुत आयेगी, बिस्तर ना मिलेगा..

येह सोच लो अब आखिरी साया है मोहोब्ब्त..

इस दर से जो उठ गये, कोई दर ना मिलेगा..

August 24, 2006 Posted by Raj Gaurav | शायरी | | No Comments Yet