पेहली नज़र में..
आसमां के नीचे.. हम आज अपने पीछे..
प्यार का जहां बसा के चले.. कदम के निशां बना के चले..
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आसमां के नीचे.. हम आज अपने पीछे..
प्यार का जहां बसा के चले.. कदम के निशां बना के चले..
–Jewel Thief
इसे “सुनें“
कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ..
या दिल का सारा प्यार लिखूँ..
कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखूँ या सापनो की सौगात लिखूँ..
मै खिलता सुरज आज लिखूँ या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ..
वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सांस लिखूँ..
वो पल मे बीते साल लिखूँ या सादियो लम्बी रात लिखूँ..
सागर सा गहरा हो जाऊं या अम्बर का विस्तार लिखूँ..
मै तुमको अपने पास लिखूँ या दूरी का ऐहसास लिखूँ..
वो पहली -पहली प्यास लिखूँ या निश्छल पहला प्यार लिखूँ..
सावन की बारिश मेँ भीगूँ या मैं आंखों की बरसात लिखूँ..
कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ..
या दिल का सारा प्यार लिखूँ..
— दिव्य प्रकाश..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते..
मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते..
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते..
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे..
तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूं..
मैं मर्घट से ज़िन्दगी बुला के लाया हूं..
हूं आंख-मिचौनी खेल चला किस्मत से..
सौ बार म्रत्यु के गले चूम आया हूं..
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी..
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
शर्म के जल से राह सदा सिंचती है..
गती की मशाल आंधी मैं ही हंसती है..
शोलो से ही श्रिंगार पथिक का होता है..
मंजिल की मांग लहू से ही सजती है..
पग में गती आती है, छाले छिलने से..
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
फूलों से जग आसान नहीं होता है..
रुकने से पग गतीवान नहीं होता है..
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगती भी..
है नाश जहां निर्मम वहीं होता है..
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे..
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता..
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता..
वेह मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर..
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ्ता जाता..
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे..
तुम मेरा मन-मानस पाशाण करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
— गोपाल दास “नीरज”
— blog courtesy “Srivani“
जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम तो जिये तेरे बिन..
आजा अब तो आजा, तू कहीं से.. ये इल्तजा ले तू सुन..
तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..
दिल मेरा हर जगह.. बस तुझे ढूंढें यार..
झील, पर्वत, हवायें हैं मेरे गवाह..
शामें हों या सुबह.. हम तुझे ढूढें यार..
आते-जाते ये मौसम हैं सारे गवाह..
जरा बता रहे.. तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..
जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम क्यूं जियें तेरे बिन..
ये मेहफ़िल, मस्तियां सब तेरे बिन उदास..
सिर्फ़ तन्हाइयां हैं.. जायें जहां..
हां ये शहर, बस्तियां सब तेरे बिन उदास..
सिर्फ़ वीरानियां हैं.. जायें जहां..
जरा बता रहे.. तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..
जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम क्यूं जियें तेरे बिन..
दिल मेरा पागल याद में तेरी.. खोया रहे हर दम..
बिन तेरे जीना है नहीं आसां, ना है मुम्किन मेरा मरना..
जरा बता रहे.. तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..
जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम तो जिये तेरे बिन..
आजा अब तो आजा तू कहीं से.. ये इल्तजा ले तू सुन..
करके मोहब्बत अपनी खता हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
दरवाजे पर आहट सुनके उसकी तरफ़ ध्यान क्यूं गया..
आने वाली सिर्फ़ हवा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
अर्ज़-ए-तलब पे उसकी चुप से ज़ाहिर है इंकार मगर..
शायद वो कुछ सोच रहा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
खून-ए-तमन्ना करना उसका शेवा है मंज़ूर मगर..
हांथ मे उसके रंग-ए-हिना हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
करके मोहब्बत अपनी खता हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
—Author Unknown..
Happy Republic Day..!!!
गुमनामियों मे रहना, नहीं है कबूल मुझको..
चलना नहीं गवारा, बस साया बनके पीछे..
वोह दिल मे ही छिपा है, सब जानते हैं लेकिन..
क्यूं भागते फ़िरते हैं, दायरो-हरम के पीछे..
अब “दोस्त” मैं कहूं या, उनको कहूं मैं “दुश्मन”..
जो मुस्कुरा रहे हैं,खंजर छुपा के अपने पीछे..
तुम चांद बनके जानम, इतराओ चाहे जितना..
पर उसको याद रखना, रोशन हो जिसके पीछे..
वोह बदगुमा है खुद को, समझे खुशी का कारण..
कि मैं चेह-चहा रहा हूं, अपने खुदा के पीछे..
इस ज़िन्दगी का मकसद, तब होगा पूरा “नीरज”..
जब लोग याद करके, मुस्कायेंगे तेरे पीछे..
—”नीरज”..
Enjoi this beautiful and colourful song from Hisham Abbas..
हम रहें या न रहें कल, कल याद आयेंगे ये पल..
पल ये हैं प्यार के पल.. चल आ मेरे संग चल..
चल सोचें क्या.. छोटी सी है ज़िन्दगी..
कल मिल जायें, तो होगी खुश-नसीबी..
हम रहें या न रहें.. कल याद आयेंगे येह पल..
हम रहें या न रहें कल, कल याद आयेंगे ये पल..
पल ये हैं प्यार के पल.. चल आ मेरे संग चल..
चल सोचें क्या.. छोटी सी है ज़िन्दगी..
कल मिल जाये, तो होगी खुश-नसीबी.. हम रहें या न रहें.. कल याद आयेंगे ये पल..
शाम का आंचल ओढ के अयी.. देखो वो रात सुहानी..
आ लिखदें हम दोनो मिलके.. अपनी ये प्रेम कहानी..
हम रहें या न रहें.. कल याद आयेंगे ये पल..
आने वाली सुबह जाने, रंग क्या लाये दीवानी..
मेरी चाहत को रख लेना, जैसे कोई निशानी..
हम रहें या न रहें.. याद आयेंगे ये पल..
हम रहें या न रहें कल, कल याद आयेंगे ये पल..
पल येह हैं प्यार के पल.. चल आ मेरे संग चल..
चल सोचें क्या.. छोटी सी है ज़िन्दगी..
कल मिल जायें, तो होगी खुश-नसीबी..
हम रहें या न रहें.. कल याद आयेंगे ये पल..
———————————————प्यार के पल..
जैसा कि आप सभी ने देखा होगा.. आम तोर पे लगभग १० मे से ९ लोग शेर-ओ-शायरी के शोकीन होते हैं..
उन ९ लोगों मे से मैं भी एक हूं.. एक अच्छा शेर मेरे लिये एक अच्छे दिन की शुरुवात होता है.. ![]()
मैं भी लिखता हूं.. पर चिन्ता ना करें आपको ऐसा torture नहीं दूंगा मैं यहां पे.. इस ब्लोग पे चुने हुए अच्छे-अच्छे शेर.. शायरी.. या गीत.. लिखने के नेक इरादे से आप सभी का स्वागत करता हूं..
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