अभी ना जाओ छोड़ कर… के दिल अभी भरा नहीं…

अभी ना जाओ छोड़ कर… के दिल अभी भरा नहीं…
अभी-अभी तो आये हो, अभी-अभी तो…
अभी-अभी तो आये हो.. बहार बन के छाए हो…
हवा ज़रा महक तो ले… नज़र ज़रा बहेक़ तो ले…
यह शाम ढल तो ले ज़रा… यह दिल संभल तो ले ज़रा…
मैं थोड़ी देर जी तो लूं… नशे के घूँट पी तो लूं…
अभी तो कुछ कहा नहीं… अभी तो कुछ सुना नहीं…
अभी ना जाओ छोड़ कर… के दिल अभी भरा नहीं…
बुरा ना मानो बात का… यह प्यार है गिला नहीं…
अधूरी आस छोड़ के… अधूरी प्यास छोड़ के…
जो रोज़ यू ही जाओगे… तो किस तरह निभाओगे…
यह ज़िन्दगी की राह मे… जवां दिलों की चाह मे…
कई मकाम आयेंगे… जो हमको आजमाएंगे…
बुरा ना मानो बात का… यह प्यार है गिला नहीं…
नहीं… नहीं… नहीं… नहीं… के दिल अभी भरा नहीं…
अभी ना जाओ छोड़ कर… के दिल अभी भरा नहीं…
—
फिल्म: हम दोनों.
“इस गाने को सुने“
शुभकामनाएं
मुझे खुशी है कि मैं आज से नियमित रूप से लिखने के लिए सक्षम हूँ ..
मैं लगभग 3 साल के बाद पोस्ट कर रहा हूँ .. मैं अपने ब्लॉग पर वापस लौटने के लिए उत्साहित हूँ.. आशा है कि एक अच्छा पोस्ट जल्द ही लिखूँगा..
इस ब्लॉग को पढ़ने के लिए धन्यवाद!
हंगामा है क्यूं बरपा.. थोडी सी जो पी ली है..
गायक - गुलाम अली
यादें.. तेरी यादें..
पेहली नज़र में..
आसमां के नीचे.. हम आज अपने पीछे..
आसमां के नीचे.. हम आज अपने पीछे..
प्यार का जहां बसा के चले.. कदम के निशां बना के चले..
…
…
आसमां के नीचे.. हम आज अपने पीछे..
प्यार का जहां बसा के चले.. कदम के निशां बना के चले..
–Jewel Thief
इसे “सुनें“
क्या लिखूँ..??
कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ..
या दिल का सारा प्यार लिखूँ..
कुछ अपनो के ज़ाज़बात लिखूँ या सापनो की सौगात लिखूँ..
मै खिलता सुरज आज लिखूँ या चेहरा चाँद गुलाब लिखूँ..
वो डूबते सुरज को देखूँ या उगते फूल की सांस लिखूँ..
वो पल मे बीते साल लिखूँ या सादियो लम्बी रात लिखूँ..
सागर सा गहरा हो जाऊं या अम्बर का विस्तार लिखूँ..
मै तुमको अपने पास लिखूँ या दूरी का ऐहसास लिखूँ..
वो पहली -पहली प्यास लिखूँ या निश्छल पहला प्यार लिखूँ..
सावन की बारिश मेँ भीगूँ या मैं आंखों की बरसात लिखूँ..
कुछ जीत लिखूँ या हार लिखूँ..
या दिल का सारा प्यार लिखूँ..
— दिव्य प्रकाश..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
हैं फ़ूल रोकते, काटें मुझे चलाते..
मरुस्थल, पहाड चलने की चाह बढाते..
सच कहता हूं जब मुश्किलें ना होती हैं..
मेरे पग तब चलने मे भी शर्माते..
मेरे संग चलने लगें हवायें जिससे..
तुम पथ के कण-कण को तूफ़ान करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
अंगार अधर पे धर मैं मुस्काया हूं..
मैं मर्घट से ज़िन्दगी बुला के लाया हूं..
हूं आंख-मिचौनी खेल चला किस्मत से..
सौ बार म्रत्यु के गले चूम आया हूं..
है नहीं स्वीकार दया अपनी भी..
तुम मत मुझपर कोई एह्सान करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
शर्म के जल से राह सदा सिंचती है..
गती की मशाल आंधी मैं ही हंसती है..
शोलो से ही श्रिंगार पथिक का होता है..
मंजिल की मांग लहू से ही सजती है..
पग में गती आती है, छाले छिलने से..
तुम पग-पग पर जलती चट्टान धरो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
फूलों से जग आसान नहीं होता है..
रुकने से पग गतीवान नहीं होता है..
अवरोध नहीं तो संभव नहीं प्रगती भी..
है नाश जहां निर्मम वहीं होता है..
मैं बसा सुकून नव-स्वर्ग “धरा” पर जिससे..
तुम मेरी हर बस्ती वीरान करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
मैं पन्थी तूफ़ानों मे राह बनाता..
मेरा दुनिया से केवल इतना नाता..
वेह मुझे रोकती है अवरोध बिछाकर..
मैं ठोकर उसे लगाकर बढ्ता जाता..
मैं ठुकरा सकूं तुम्हें भी हंसकर जिससे..
तुम मेरा मन-मानस पाशाण करो..
मैं तूफ़ानों मे चलने का आदी हूं..
तुम मत मेरी मंजिल आसान करो..
— गोपाल दास “नीरज”
— blog courtesy “Srivani“
जीना तेरे बिना..
जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम तो जिये तेरे बिन..
आजा अब तो आजा, तू कहीं से.. ये इल्तजा ले तू सुन..
तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..
दिल मेरा हर जगह.. बस तुझे ढूंढें यार..
झील, पर्वत, हवायें हैं मेरे गवाह..
शामें हों या सुबह.. हम तुझे ढूढें यार..
आते-जाते ये मौसम हैं सारे गवाह..
जरा बता रहे.. तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..
जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम क्यूं जियें तेरे बिन..
ये मेहफ़िल, मस्तियां सब तेरे बिन उदास..
सिर्फ़ तन्हाइयां हैं.. जायें जहां..
हां ये शहर, बस्तियां सब तेरे बिन उदास..
सिर्फ़ वीरानियां हैं.. जायें जहां..
जरा बता रहे.. तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..
जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम क्यूं जियें तेरे बिन..
दिल मेरा पागल याद में तेरी.. खोया रहे हर दम..
बिन तेरे जीना है नहीं आसां, ना है मुम्किन मेरा मरना..
जरा बता रहे.. तेरे बिना जीना कुछ भी नहीं..
जीना.. तेरे बिना जीना.. मौत लगे.. हम तो जिये तेरे बिन..
आजा अब तो आजा तू कहीं से.. ये इल्तजा ले तू सुन..
हो सकता है..
करके मोहब्बत अपनी खता हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
दरवाजे पर आहट सुनके उसकी तरफ़ ध्यान क्यूं गया..
आने वाली सिर्फ़ हवा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
अर्ज़-ए-तलब पे उसकी चुप से ज़ाहिर है इंकार मगर..
शायद वो कुछ सोच रहा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
खून-ए-तमन्ना करना उसका शेवा है मंज़ूर मगर..
हांथ मे उसके रंग-ए-हिना हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
करके मोहब्बत अपनी खता हो.. ऐसा भी हो सकता है..
वोह अब भी पाबंद-ए-वफ़ा हो.. ऐसा भी हो सकता है..
—Author Unknown..







